Saturday, June 6, 2009

unknown

साथ दे तकदीर गर राहत रसन तकदीर तदबीर का
जेहन से हो खात्मा नाम-ओ-निशान तकसीर का
चाँद से आगे है कोई बैस-ए-इल्म-ए-जदीद
और हम किस्सा लिए बैठे हैं रांझे हीर का
मेल-ए-तखरीब आते हैं नज़र वो एहल-ए-इल्म
जिन से मुल्क-ओ-कौम को था आसरा तामीर का
एहद-ए-हाज़िर में किसी के एहद पर तकिया न कर
हाकिम-ओ-महकूम का हो, या मुरीद-ओ-पीर का
कुर्ब-ए-अलीम से न हो जाओ कहें फिरका परस्त
जाने कब इल्जाम लग जाए तुम्हें तकफीर का
आपको देखा, गया एहसास-ए-बार-ए-इंतज़ार
शहर-ए-हंगामा है क्या शिकवा गिला ताखीर का

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