बह गया सैल-ए-हकीक़त में, फ़साना इक और
पहले भी खाई थी इक दस्त-ए-मसीहा ने शिकस्त
आज नाकाम हुआ दस्त-ए-मसीहा इक और
दाम-ए-हालत से निकल ही थे हम लोग के फिर
दाम तकदीर ने राहों में बिछाया इक और
हो गया चाक कहीं कोई गिरेबान फिर से
मिल गया खान में हुस्न-ए-रुख-ए-जेबा इक और
फिर कोई लैला हुई कसर-ए-रिवायत में असीर
फिर हुआ क़ैस सू-ए-दस्त रवाना इक और
ग़म-ए-हालात था, अब मुझको ग़म-ए-इश्क भी है
हो गया हश्र मेरी जात में बरपा इक और
फिर नई सम्त में आगाज़-ए-सफर है 'जीशान'
चलते चलते कहीं गम हो गया जायदा इक और
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