Friday, May 29, 2009

nida fazli ki shayyiri

धुप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
वो सितारा है चमकने दो युही आंखों में
क्या ज़रूरी है उससे जिस्म बना कर देखो
पत्थरों में भी जुबा होती है, दिल होते हैं
अपने घर की दर-ओ-दीवार सजा कर देखो
फासला नज़रों का धोखा भी तोह हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो

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